
सेना का मतलब सिर्फ वर्दी और हथियार नहीं, बल्कि अटूट अनुशासन और एकजुटता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में साफ कह दिया कि कोई भी अधिकारी अपनी निजी आस्था को सेना के आदेशों से ऊपर नहीं रख सकता। यह फैसला न सिर्फ सेना की धर्मनिरपेक्ष छवि को मजबूत करता है, बल्कि हर सैनिक के लिए एक सीख भी है।
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क्या था पूरा मामला?
एक युवा ईसाई अधिकारी को 2017 में थर्ड कैवेलरी रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट के तौर पर भर्ती किया गया। यह रेजिमेंट मुख्य रूप से सिख, जाट और राजपूत सैनिकों वाली है। उन्हें स्क्वाड्रन का ट्रूप लीडर बनाया गया, जहां सिख सिपाहियों के साथ धार्मिक परेड का नेतृत्व करना पड़ता था। लेकिन उन्होंने मना कर दिया, कहते हुए कि रेजिमेंट में सिर्फ मंदिर और गुरुद्वारा हैं, और ईसाई होने के नाते वे वहां नहीं जा सकते।
सेना ने क्या कोशिशें कीं?
सेना ने कई बार समझाने की कोशिश की। दूसरे ईसाई अधिकारियों को बुलाया, यहां तक कि स्थानीय पादरी ने भी सलाह दी कि सामूहिक धर्मस्थल में जाना आस्था के खिलाफ नहीं। लेकिन अधिकारी नहीं माने। आखिरकार, थल सेना प्रमुख के आदेश पर 2021 में उन्हें पेंशन-ग्रेच्युटी के बिना बर्खास्त कर दिया गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मई में इस फैसले को सही ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि सेना पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष है, जहां अनुशासन सर्वोपरि। “ऐसा व्यक्ति सेना में रहने लायक नहीं जो व्यक्तिगत आस्था के आधार पर रेजिमेंट के धर्मस्थल जाने से मना करे।” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इससे साथियों की भावनाओं को चोट पहुंची और यह घोर अनुशासनहीनता है।
सेना की धर्मनिरपेक्षता का मतलब
सेना में हिंदू अधिकारी गुरुद्वारे जाते हैं, मुस्लिम मंदिरों में यही हमारी एकता है। जातिगत रेजिमेंट होने के बावजूद वर्दी सबको बराबर बनाती है। कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन वर्दी में आदेशों का पालन जरूरी। यह फैसला सेना की मजबूत परंपरा को और मजबूत करता है।
















