
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है जो लाखों भारतीयों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा है कि आधार कार्ड किसी व्यक्ति की उम्र निर्धारित करने के लिए एक मान्य दस्तावेज़ नहीं है। यह फैसला सड़क दुर्घटना से जुड़े एक मुआवजे के मामले में सुना गया था जहां मृतक की उम्र के बारे में विवाद पैदा हो गया था।
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क्यों आया यह फैसला?
इस पूरे मामले की शुरुआत 2015 में एक सड़क दुर्घटना से हुई थी जिसमें एक व्यक्ति की जान चली गई थी। उसके परिवार को मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) की ओर से शुरुआत में 19.35 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था। लेकिन जब मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट तक पहुंचा तो चीजें बदल गईं। हाई कोर्ट ने मृतक के आधार कार्ड के आधार पर उसकी उम्र 47 साल बताई और मुआवजा घटाकर 9.22 लाख रुपये कर दिया।
मृतक के परिवार को यह फैसला गलत लगा। उनका कहना था कि अगर स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र (जिसे स्कूल की ऑफिसियल रिकॉर्ड कहते हैं) के अनुसार देखा जाए तो मृत्यु के समय उसकी उम्र 45 साल थी। यह दो साल का अंतर लग सकता है छोटा सा, लेकिन मुआवजे की गणना में यह काफी बड़ा अंतर बनाता है।
स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र को क्यों ज़्यादा महत्व दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ़ किया है कि मृतक की उम्र स्कूल छोड़ने के प्रमाण पत्र में दर्ज तारीख़ के आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए। इसका कारण यह है कि स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र एक औपचारिक और कानूनी दस्तावेज़ है जिसमें छात्र की जन्मतारीख़ दर्ज होती है। स्कूलों के पास इन रिकॉर्ड्स को बनाए रखने के लिए कानूनी दायित्व होता है।
कोर्ट ने किशोर न्याय (बाल देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2015 की धारा 94 का हवाला दिया। इस कानूनी धारा में कहा गया है कि किसी की उम्र निर्धारित करते समय स्कूल से जारी किए गए औपचारिक दस्तावेज़ को सबसे ज़्यादा महत्व दिया जाए। यह व्यवस्था सिर्फ़ मुआवजे के मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई अन्य कानूनी मामलों में भी लागू होती है।
आधार कार्ड की सीमाएं
यह बहुत दिलचस्प बात है कि आधार कार्ड को भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने खुद भी अपने सर्कुलर संख्या 8/2023 में स्वीकार किया है कि आधार कार्ड केवल पहचान स्थापित करने के लिए है। इसका मतलब यह है कि आधार से पता चलता है कि व्यक्ति कौन है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि उसमें दर्ज जन्मतारीख़ सही हो।
आधार कार्ड के लिए आवेदन करते समय किसी को कई दस्तावेज़ जमा करने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी तो सिर्फ़ बायोमेट्रिक डेटा से भी काम हो जाता है। इसलिए आधार में दर्ज जन्मतारीख़ शत-प्रतिशत सही नहीं हो सकती। इसके विपरीत, स्कूल के रिकॉर्ड्स को दशकों से सुरक्षित रखा जाता है और उनमें किसी को भी गलती की गुंजाइश कम होती है।
मुआवजे में बदलाव
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुआवजे की रकम में भी बदलाव आया। अदालत ने आयु गुणक (एज मल्टीप्लायर) को 13 से बदलकर 14 कर दिया क्योंकि 45 साल की उम्र के लिए 14 गुणक लागू होता है। इसके अलावा कुछ अन्य कानूनी सिद्धांतों को लागू करके मुआवजे की कुल राशि को 15 लाख रुपये तय किया गया।
यह फैसला सिर्फ़ इस एक मामले के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे सभी मामलों में एक नजीर स्थापित करता है। अब सरकारी विभाग, कानूनी पेशेवर और सभी लोगों को पता चल गया है कि आधार कार्ड को उम्र निर्धारण का प्रमाण माना जा सकता है।
















