
उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी प्राप्त करने का कोई निहित ‘अधिकार’ (Right) नहीं है, यह नियुक्ति केवल एक रियायत या सुविधा है, जिसका उद्देश्य मृतक के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से उबारना है।
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फैसले की मुख्य बातें
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में इस बात पर जोर दिया कि अनुकंपा नियुक्ति को कानूनी अधिकार के तौर पर दावा नहीं किया जा सकता यह फैसला सरकारी नौकरियों में आश्रितों की नियुक्ति को लेकर एक मानक स्थापित करता है।
‘अधिकार’ नहीं, आर्थिक सहायता
- न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा, “अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आई वित्तीय आपदा से तत्काल राहत प्रदान करना है, न कि मृतक के परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी में समायोजित करना।”
केवल गंभीर आर्थिक संकट में
यह सुविधा केवल उन्हीं मामलों में दी जाएगी जहाँ परिवार वास्तव में गंभीर आर्थिक तंगी का सामना कर रहा हो और उसके पास जीवनयापन के लिए आय का कोई अन्य पर्याप्त स्रोत उपलब्ध न हो। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है या उन्हें अन्य स्रोतों से पेंशन/आय मिल रही है, तो दावे को अस्वीकार किया जा सकता है।
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नियम और नीति सर्वोपरि
- कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अनुकंपा नियुक्ति हमेशा संबंधित विभाग द्वारा निर्धारित मौजूदा नियमों और नीतियों के दायरे में ही होनी चाहिए। मनमाने ढंग से नियुक्ति नहीं की जा सकती।
लंबित मामलों पर सख्ती
- न्यायालय ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई बार अनुकंपा नियुक्ति के मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं, जिससे इसका मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि इन मामलों का निपटारा एक निश्चित समय-सीमा के भीतर किया जाना चाहिए।
प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब सरकारी विभागों को अनुकंपा नियुक्ति के आवेदनों को निपटाने में स्पष्टता मिलेगी, यह फैसला उन आश्रितों के लिए एक बड़ा झटका है जो अनुकंपा नियुक्ति को अपना कानूनी अधिकार मानते थे, अब उन्हें नियुक्ति के लिए यह साबित करना होगा कि उनका परिवार वास्तव में घोर आर्थिक संकट में है।
















