
संपत्ति विवादों को लेकर हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत का केवल लिखा होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी कानूनी वैधता के लिए पंजीकरण (Registration) अनिवार्य है,अदालत ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए बिना रजिस्टर्ड वसीयत के दावे को खारिज कर दिया और संपत्ति पर बेटी के अधिकार को सर्वोपरि माना।
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क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, यह विवाद एक परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर था, जहाँ वसीयत के आधार पर बेटी के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। कोर्ट में पेश की गई वसीयत रजिस्टर्ड नहीं थी, जिसके आधार पर संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया जा रहा था, हाई कोर्ट ने इस दावे को कमजोर मानते हुए खारिज कर दिया और बेटी के पक्ष में फैसला सुनाया।
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश ने कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
- कोर्ट ने कहा कि अनरजिस्टर्ड वसीयत की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रहती है। संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए वसीयत का विधिवत पंजीकृत होना उसकी सत्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
- अदालत ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम का हवाला देते हुए दोहराया कि बेटियों को अपने पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर ही कानूनी अधिकार प्राप्त हैं। किसी भी संदिग्ध दस्तावेज के आधार पर उन्हें इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति वसीयत के आधार पर हक जता रहा है, उसे ही यह साबित करना होगा कि वसीयत बिना किसी दबाव और पूर्णतः स्वेच्छा से तैयार की गई थी।
आम जनता के लिए सबक
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से वसीयत लिखने की प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी, यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का बंटवारा अपनी इच्छानुसार करना चाहता है, तो उसे भविष्य के विवादों से बचने के लिए वसीयत का पंजीकरण जरूर कराना चाहिए।
कानूनी मदद के लिए लिंक
- संपत्ति और वसीयत से संबंधित कानूनों को विस्तार से पढ़ने के लिए Indian Kanoon की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।
- वसीयत पंजीकरण की ऑनलाइन प्रक्रिया के लिए National Government Services Portal का संदर्भ लें।
इस फैसले के बाद अब यह साफ हो गया है कि केवल कागजों पर लिखी गई वसीयत कोर्ट में टिक नहीं पाएगी, खासकर तब जब वह रजिस्टर्ड न हो और उत्तराधिकार के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करती हो।
















