
उत्तराखंड के टिहरी जनपद में District Magistrate (DM) के एक आदेश ने शिक्षा विभाग से जुड़े हजारों शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। दरअसल, डीएम ने 45 साल पुराने उस सरकारी आदेश को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं, जो उत्तर प्रदेश के दौर में 15 दिसंबर 1981 को जारी हुआ था। इस आदेश के तहत सभी सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर शिक्षकों को अपने कार्यस्थल यानी स्कूल से अधिकतम आठ किमी के दायरे में ही निवास करना अनिवार्य है। आदेश के लागू होते ही शिक्षकों में खलबली मच गई है।
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जनप्रतिनिधियों की शिकायत से शुरू हुआ मामला
हाल ही में टिहरी की जिलाधिकारी नितिका खंडेलवाल के समक्ष कुछ जनप्रतिनिधियों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि कई शिक्षक अपने तैनाती स्थल के आसपास नहीं रहते। शिकायत में कहा गया कि शिक्षक रोजाना 50 से 80 किमी तक का लंबा सफर तय कर स्कूल पहुंचते हैं, जिससे वे थकान की स्थिति में पढ़ाने पहुंचते हैं। इसका सीधा असर न केवल उनकी कार्यक्षमता पर पड़ता है, बल्कि छात्रों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है।
शिकायत में यह भी बताया गया कि कई बार वाहन उपलब्ध न होने या सड़क व मौसम की खराब स्थिति के कारण शिक्षक समय पर स्कूल नहीं पहुंच पाते। इन गंभीर आरोपों को देखते हुए डीएम ने शिक्षा विभाग से ऐसे शिक्षकों की सूची मांगी है, जिनका आवास स्कूल से काफी दूर है।
आठ किमी के दायरे में रहने का निर्देश
डीएम द्वारा जारी आदेश के अनुसार अब शिक्षकों को अपने स्कूल से अधिकतम आठ किमी के दायरे में ही रहना होगा। जो शिक्षक इससे अधिक दूरी पर निवास कर रहे हैं, उन्हें या तो स्कूल के पास किराए पर कमरा लेना होगा या फिर विभागीय अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेनी होगी।
यह आदेश उन शिक्षकों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है, जिन्होंने देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार जैसे शहरों में स्थायी आवास बना रखे हैं और रोजाना पहाड़ी क्षेत्रों के स्कूलों में ड्यूटी करने जाते हैं। छुट्टी होते ही परिवार के पास लौटने वाले इन शिक्षकों के सामने अब नई चुनौती खड़ी हो गई है।
80 किमी तक का सफर तय कर रहे हैं शिक्षक
उत्तराखंड के कई जिलों में यह आम बात है कि शिक्षक प्रतिदिन लंबी दूरी तय कर स्कूल पहुंचते हैं। देहरादून और ऋषिकेश से देवप्रयाग तक, कोटद्वार से पौड़ी, हल्द्वानी से अल्मोड़ा या रामनगर से पिथौरागढ़ तक शिक्षक रोजाना 50 से 80 किमी तक का सफर करते हैं।
कई शिक्षक अपनी निजी गाड़ियों से यात्रा करते हैं, जबकि कुछ शिक्षक समूह बनाकर टैक्सी हायर करते हैं। पहाड़ी रास्तों, मौसम की मार और सीमित परिवहन सुविधाओं के बीच यह सफर न केवल समय लेने वाला है, बल्कि जोखिम भरा भी है।
1981 का आदेश फिर चर्चा में
जिस आदेश को अब सख्ती से लागू किया जा रहा है, वह 15 दिसंबर 1981 को यूपी शासनकाल के दौरान जारी किया गया था। इस नियमावली के अनुसार सभी सरकारी विभागों के कार्मिकों को अपने कार्यस्थल से आठ किमी के भीतर निवास करना अनिवार्य है।
नियम यह भी कहता है कि यदि कोई कर्मचारी इस दायरे से बाहर रहता है, तो उसे इसकी सूचना विभागीय अधिकारियों को देनी होगी और लिखित अनुमति लेनी होगी। हालांकि, लंबे समय से इस आदेश का पालन ढीले-ढाले तरीके से हो रहा था, लेकिन अब इसे सख्ती से लागू किया जा रहा है।
केवल शिक्षकों पर ही क्यों सख्ती?
इस पूरे मामले में शिक्षकों के बीच एक और सवाल चर्चा में है। फिलहाल अन्य विभागों से इस तरह की कोई सूची नहीं मांगी गई है और न ही उन पर इस आदेश को लागू करने की बात सामने आई है। ऐसे में शिक्षक संगठन सवाल उठा रहे हैं कि केवल शिक्षा विभाग को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है।
शिक्षकों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में आवास, बिजली, पानी और इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। Digital Education, ऑनलाइन रिपोर्टिंग और प्रशासनिक कार्यों के लिए शहरों में रहना कई बार मजबूरी बन जाता है।
प्रशासन का तर्क और आगे की राह
प्रशासन का तर्क है कि शिक्षकों की नियमित उपस्थिति और समयबद्ध स्कूल पहुंच सुनिश्चित करने के लिए यह फैसला जरूरी है। इससे छात्रों की पढ़ाई में सुधार होगा और शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी।
हालांकि, शिक्षक संगठनों का कहना है कि इस आदेश को लागू करने से पहले जमीनी हकीकत को समझना जरूरी है। अगर सरकार और प्रशासन आवासीय सुविधाओं, सड़क और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को बेहतर बनाए, तो शिक्षक भी खुशी-खुशी स्कूल के पास रहने को तैयार हैं।
















