
भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर तीखी बहस देखने को मिल रही है। शेख हसीना सरकार के हटने के बाद बांग्लादेश की सत्ता पर कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव की चर्चा तेज है। मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को लेकर भी यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि वे इन ताकतों के दबाव में काम कर रहे हैं। इसी बीच भारत विरोधी बयानबाजी और पूर्वोत्तर भारत को देश से अलग-थलग करने की धमकियों ने Siliguri Corridor, जिसे आम भाषा में चिकन नेक-Chicken Neck कहा जाता है, को एक बार फिर रणनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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चिकन नेक क्या है और क्यों है अहम?
सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की वह संकरी पट्टी है जो देश के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भारत से जोड़ती है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर बेहद कम मानी जाती है, इसी कारण इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र कहा जाता है।
सोशल मीडिया और रणनीतिक हलकों में यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि बांग्लादेश का रंगपुर डिविजन-Rangpur Division उससे अलग होता है, तो भारत का चिकन नेक कथित तौर पर 120 से 150 किलोमीटर तक चौड़ा हो सकता है, जिससे सुरक्षा और संपर्क दोनों मजबूत होंगे।
रंगपुर डिविजन: भौगोलिक स्थिति और रणनीतिक महत्व
रंगपुर डिविजन को बांग्लादेश की “सबसे कमजोर कड़ी” बताया जा रहा है। इसके लगभग चारों ओर भारत की सीमा लगती है और इसका करीब 90 फीसदी बॉर्डर पश्चिम बंगाल से जुड़ा हुआ है।
क्षेत्रफल की बात करें तो रंगपुर डिविजन लगभग 16,185 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहां की कुल आबादी करीब 1.9 करोड़ बताई जाती है, जिसमें औसतन प्रति वर्ग किलोमीटर 1,200 लोग रहते हैं। यह इसे बांग्लादेश के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में शामिल करता है।
23 लाख हिंदू आबादी और डेमोग्राफिक फैक्टर
रंगपुर डिविजन में करीब 23 लाख हिंदू निवास करते हैं, जो कुल आबादी का लगभग 13 फीसदी हैं। मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 86 फीसदी बताई जाती है।
प्रतिशत के हिसाब से बांग्लादेश में हिंदू आबादी वाला सबसे बड़ा डिविजन सिलहट (13.51%) है, जबकि संख्या के आधार पर ढाका डिविजन में करीब 28 लाख हिंदू रहते हैं। हालांकि ढाका की कुल आबादी 4.42 करोड़ होने के कारण वहां प्रतिशत केवल 6.26% के आसपास है।
सोशल मीडिया पर उठती मांगें और India Security Debate
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ वर्ग यह तर्क दे रहे हैं कि भारत को अपने National Interest को प्राथमिकता देते हुए रंगपुर डिविजन के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाना चाहिए। दावा किया जा रहा है कि केवल इस डिविजन के अलग होने से ही भारत की एक बड़ी रणनीतिक समस्या हल हो सकती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी रेखांकित करते हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संप्रभुता के सिद्धांतों का सम्मान करता है, इसलिए किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप आसान या त्वरित विकल्प नहीं है।
International Example: रूस-यूक्रेन युद्ध का संदर्भ
इस बहस में Russia-Ukraine War का उदाहरण भी दिया जा रहा है। तर्क यह है कि जब किसी देश की सुरक्षा को सीधा खतरा महसूस होता है, तो वह सैन्य कदम उठाने को मजबूर हो सकता है।
हालांकि यह भी स्वीकार किया जाता है कि ऐसे संघर्ष व्यापक आर्थिक नुकसान, वैश्विक दबाव और लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता को जन्म देते हैं। इसलिए India जैसे देश के लिए ऐसा निर्णय बेहद सोच-समझकर लिया जाने वाला कदम होगा।
1971 का ऐतिहासिक संदर्भ
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि 1971 में Bangladesh Liberation War के दौरान भारत के पास अवसर था कि वह सिलिगुड़ी कॉरिडोर को चौड़ा करने के लिए अलग व्यवस्था करे। उस समय भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद निर्णायक भूमिका निभाई और बांग्लादेश का निर्माण संभव हुआ।
आज, दशकों बाद, वही क्षेत्र एक बार फिर रणनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
क्या रंगपुर का अलग होना व्यावहारिक है?
विशेषज्ञों के अनुसार, सीधे सैन्य हस्तक्षेप से किसी डिविजन को अलग करना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। यह तभी संभव हो सकता है जब स्थानीय स्तर पर गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठें।
भारत के लिए प्राथमिकता फिलहाल क्षेत्रीय स्थिरता, कूटनीति और सुरक्षा संतुलन बनाए रखना ही मानी जा रही है।
















