
केरल हाई कोर्ट (Kerala High Court) ने संपत्ति के बंटवारे (Property Distribution) के एक विवादित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि शादी के चार महीने बाद पैदा हुआ बच्चा भी पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सेदार (Equal Share in Property) होगा। यह फैसला उन परिवारों के लिए अहम है, जहां बच्चों का जन्म शादी के तुरंत बाद नहीं हुआ।
मामला उस व्यक्ति की संपत्ति का था, जिसकी मौत दिसंबर 2012 में हुई थी। दिवंगत व्यक्ति ने अपनी संपत्ति (Property) की वसीयत (Will) नहीं बनाई थी, जिसके कारण उसके परिवार में संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
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निचली अदालत ने बच्चे को नहीं माना वारिस
संपत्ति विवाद की शुरुआत उस समय हुई, जब दिवंगत की पत्नी ने अपने पति की संपत्ति के लिए निचली अदालत (Lower Court) में याचिका दायर की। महिला ने अदालत से अनुरोध किया कि संपत्ति को चार हिस्सों में बांटा जाए। इसके हिस्सेदारों में मृतक की पत्नी, उनके दो बच्चे और वृद्ध माता शामिल थे।
हालांकि, निचली अदालत ने महिला की अपील को खारिज कर दिया और केवल तीन हिस्सों का आदेश दिया। अदालत ने महिला के बड़े बेटे को संपत्ति का वारिस नहीं माना, क्योंकि वह शादी के केवल चार महीने बाद पैदा हुआ था। निचली अदालत के अनुसार, बच्चा उस समय पैदा नहीं हुआ था जब माता-पिता वैध रूप से शादीशुदा थे।
हाई कोर्ट में हुई सुनवाई: विवाह पूर्व संबंधों पर बहस
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ महिला ने केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच—जस्टिस सतीश निनान और पी. कृष्ण कुमार—ने मामले की सुनवाई की।
महिला की ओर से पेश वकीलों आर. श्रीहरी, सचिन व्यास और पी. बी. कृष्णनन ने दलील दी कि बच्चे का गर्भधारण शादी से पहले हुआ था, लेकिन माता-पिता का वैध और स्थायी संबंध उस समय मौजूद था।
वहीं, प्रतिवादी पक्ष के वकील अशोक कुमार, बिंदु श्रीधर और आसिफ एन. ने दावा किया कि यह एक अरेंज मैरिज (Arranged Marriage) थी और शादी से पहले दोनों का मिलना-जुलना संभव नहीं था। उनका कहना था कि जिस समय बच्चा गर्भ में आया, उस समय माता-पिता की सगाई (Engagement) भी नहीं हुई थी।
हाई कोर्ट का फैसला: शादी के दौरान जन्म के बच्चे को वैध माना
केरल हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और कहा कि भारतीय कानून (Indian Law) हमेशा बच्चे की वैधता (Legitimacy) के पक्ष में है, खासकर जब वह शादी के दौरान पैदा हुआ हो।
कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 112 (Section 112) का हवाला देते हुए कहा कि “शादी के दौरान पैदा हुआ बच्चा वैध माना जाएगा। इसे तभी गलत साबित किया जा सकता है, जब यह साबित किया जाए कि बच्चे के जन्म के समय माता-पिता के बीच कोई वैध संबंध नहीं था।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 112 लागू होने के लिए जरूरी नहीं है कि बच्चा शादी के बाद ही जन्मे। गर्भधारण शादी से पहले भी हो सकता है, लेकिन बच्चे की वैधता माता-पिता के रिश्ते (Parents’ Relationship) पर निर्भर करती है, न कि बच्चे के जन्म के समय पर।
न्यायपालिका का संदेश और संपत्ति अधिकार
केरल हाई कोर्ट का यह निर्णय परिवारों और कानूनी विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर (Landmark Judgment) है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बच्चों को उनके जन्म समय या विवाह के तुरंत बाद होने पर नहीं, बल्कि उनके माता-पिता के वैध रिश्ते के आधार पर अधिकार (Property Rights) मिलेंगे।
विशेष रूप से, इस फैसले से यह सुनिश्चित होगा कि शादी के कुछ महीनों बाद जन्मे बच्चे भी पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा पाएंगे। इससे न केवल पारिवारिक विवादों को कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि भारतीय कानून में बच्चे की वैधता और वारिस के अधिकार को मजबूत किया जाएगा।
संपत्ति विवाद के बाद समाज और कानूनी दृष्टिकोण
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला पारंपरिक सोच में बदलाव लाएगा। पहले, कई बार बच्चे को तब तक वारिस नहीं माना जाता था जब तक वह शादी के तुरंत बाद पैदा न हो। अब यह स्पष्ट हो गया है कि माता-पिता के वैध रिश्ते को मान्यता मिलना चाहिए।
इसके अलावा, यह फैसला बच्चों के अधिकारों (Children’s Rights) और महिलाओं के अधिकारों (Women’s Rights) को भी मजबूत करता है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे और मां दोनों को न्यायिक रूप से सुरक्षित हिस्सेदारी मिले।
















