
ईरान की अर्थव्यवस्था इस वक्त अपने सबसे काले दौर से गुजर रही है, देश की मुद्रा ‘रियाल’ में आई ऐतिहासिक गिरावट ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है, दिसंबर 2025 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत अब 14.2 लाख ईरानी रियाल के स्तर को पार कर गई है, इस मुद्रा संकट ने न केवल ईरान के भीतर हड़कंप मचा दिया है, बल्कि भारत समेत कई वैश्विक शक्तियों की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।
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बाजारों में सन्नाटा, सड़कों पर आक्रोश
ईरान के केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा को संभालने के तमाम प्रयास विफल साबित हुए हैं। डॉलर की आसमान छूती कीमतों के कारण ईरान में महंगाई दर 42% के पार जा चुकी है, जबकि खाने-पीने की चीजों के दाम 70% से अधिक बढ़ गए हैं। तेहरान के ऐतिहासिक ग्रैंड बाजार में व्यापारियों ने दुकानें बंद कर दी हैं और देश के प्रमुख शहरों में आर्थिक कुप्रबंधन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ईरान के सेंट्रल बैंक के गवर्नर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है।
भारत पर क्या होगा असर?
ईरान में मचे इस आर्थिक घमासान का सीधा असर भारत पर पड़ना तय माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके तीन मुख्य प्रभाव होंगे:
- भारत, ईरान को बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। रियाल की वैल्यू गिरने से ईरानी खरीदारों के लिए भारतीय चावल खरीदना बेहद महंगा हो गया है। भुगतान (Payment) अटकने के डर से भारतीय निर्यातकों ने नए ऑर्डर लेने कम कर दिए हैं।
- ईरान मध्य-पूर्व का एक महत्वपूर्ण तेल उत्पादक है। वहां की राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता वैश्विक तेल सप्लाई चेन को बाधित कर सकती है। अगर कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर से उछाल देखने को मिल सकता है।
- तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे डॉलर की मांग बढ़ेगी, इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ेगा, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में दबाव का सामना कर रहा है।
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क्यों आई यह नौबत?
आर्थिक जानकारों का मानना है कि ईरान पर लगे कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, क्षेत्रीय तनाव और घरेलू बैंकों में बढ़ता भ्रष्टाचार इस संकट की मुख्य वजह हैं, विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और डॉलर की जमाखोरी ने रियाल को रद्दी के भाव पर लाकर खड़ा कर दिया है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें ईरान के अगले कदम पर टिकी हैं, यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो यह न केवल मध्य-पूर्व की स्थिरता को खतरे में डालेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार के समीकरण भी बदल देगा।
















