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Dowry Case: “शादी को कारोबार मत बनाओ!” दहेज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त—हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में दहेज मामलों पर सख्त रुख अपनाया। एक केस में जमानत ठुकराते हुए कहा- विवाह पवित्र बंधन है, न कि व्यावसायिक लेन-देन। दूसरे में हाईकोर्ट के FIR रद्द फैसले को पलट दिया, क्योंकि प्रथम दृष्टया अपराध साफ था। कोर्ट बोला- दहेज हत्या समाज के खिलाफ अपराध, नरमी नहीं चलेगी। धारा 498A का दुरुपयोग चिंता का विषय, लेकिन वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिले।

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marriages have become a business supreme court furious over dowry high court order overturned

दहेज प्रथा हमारे समाज के लिए एक गंभीर और जटिल समस्या बनी हुई है, जो वर्षों से महिलाओं के लिए हिंसा और उत्पीड़न का कारण बनती रही है। हाल ही में नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सामाजिक बुराई पर अपनी सख्त प्रतिक्रिया जाहिर की है। दो अलग-अलग मामलों में कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि दहेज से जुड़े अपराधों में कोई नरमी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और विवाह को केवल एक व्यवसाय या लेनदेन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इन फैसलों से यह स्पष्ट संदेश मिला है कि न्यायपालिका समाज में दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए संकल्पित है।

विवाह एक पवित्र संस्था है, व्यवसाय नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने एक जमानत याचिका पर फैसला देते हुए जोर दिया कि विवाह किसी भी हालत में एक व्यवसाय या व्यापारिक लेनदेन नहीं हो सकता। यह संवैधानिक और सांस्कृतिक रूप से भी एक पवित्र रिश्ता है, जो सम्मान और विश्वास पर आधारित होता है। लेकिन दहेज की जमा पूंजी जिसने इसे पैसे की अदला-बदली जैसी लेनदेन प्रक्रिया में बदल दिया है, वह घातक और जघन्य अपराधों को जन्म देता है। इसी मामले में जहां आरोपी पर अपनी पत्नी को जहर देने का आरोप था, कोर्ट ने कहा कि दहेज हत्या जैसे मामलों में司法 को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि निवारक संदेश society तक पहुंचे।

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा

दूसरे मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें दहेज उत्पीड़न के तहत प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि FIR रद्द करने के लिए हाईकोर्ट को मामले की पूरी गहराई में जाकर “मिनी-ट्रायल” आयोजित करने का अधिकार नहीं है। जब FIR में प्रथम दृष्टया अपराध के स्पष्ट आरोप साबित होते हैं, तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए और बिना उचित जांच अधिकृत फैसले नहीं होने चाहिए।

दहेज उत्पीड़न के मामलों में न्यायिक सख्ती जरूरी

कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज से उत्पन्न बर्बरता को समाज या कानून किसी भी संभावित रूप में बर्दाश्त नहीं करेगा। ऐसे अपराधों पर कड़ी और निवारक न्यायिक कार्रवाई समाज में व्याप्त इस कुप्रथा को खत्म करने में मदद करेगी। महिलाओं के खिलाफ दहेज के नाम पर होने वाला शोषण और हिंसा केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज के विरुद्ध अपराध है। यह महिलाओं के जीवन को कमजोर करने वाली एक बड़ी सामाजिक समस्या है। इसलिए कानून निर्माता और न्यायपालिका को इसे रोकने के लिए पूरी कड़ाई से काम करना होगा।

दहेज कानूनों की बारीकियां और दुरुपयोग की चिंता

दहेज कानून, खासतौर पर IPC की धारा 498A में कहीं न कहीं मानसिक उत्पीड़न और वित्तीय दबाव पर भी ध्यान दिया गया है। इसका मतलब यह नहीं कि दहेज मांगना या क्रूरता का प्रमाण सिर्फ भौतिक मांग तक सीमित हो। कोर्ट ने यह भी माना कि कुछ मामलों में इन कानूनों का दुरुपयोग हो सकता है, जहां व्यक्तिगत निजी मनमुटाव के कारण गलत आरोप लगाए जा सकते हैं। लेकिन यह भी जरूरी है कि दुरुपयोग की आशंका के नाम पर वास्तविक मामलों की जांच और कार्रवाई को कमजोर न किया जाए।

Author
Divya

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