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Swiggy, Zomato और Uber की नई पॉलिसी से सब हो जाएगा महंगा, ऑनलाइन फूड और राइड सर्विस महंगी होने के संकेत

भारत में नए लेबर कोड लागू होने से स्विगी, जोमैटो और ओला जैसी गिग-इकॉनमी कंपनियों की लागत बढ़ेगी। ये प्लेटफॉर्म्स को गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड में योगदान देना होगा। फूड ऑर्डर पर 3.2 रुपये और क्विक-कॉमर्स पर 2.4 रुपये का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। हालांकि डिलीवरी पार्टनर्स को पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और दुर्घटना कवरेज जैसे लाभ मिलेंगे।

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online food rides may get expensive new plans

भारत के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ आ गया है। जब सरकार ने नवंबर 2025 में चार नए लेबर कोड लागू किए, तो स्विगी, जोमैटो, ओला और उबर जैसी कंपनियों को एहसास हो गया कि अब खेल के नियम बदल गए हैं। गिग वर्कर्स को औपचारिक सामाजिक सुरक्षा देने का यह निर्णय एक ओर तो लाखों डिलीवरी पार्टनर्स और राइड शेयरिंग ड्राइवर्स के लिए एक जीत है, लेकिन दूसरी ओर यह इन प्लेटफॉर्मों की परिचालन लागत को भी काफी हद तक बढ़ा देगा।​

ग्राहकों की जेब पर असर

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के अनुसार, नए लेबर कोड के तहत ये प्लेटफॉर्म्स को अपने सालाना टर्नओवर का 1 से 2 प्रतिशत या कुल भुगतान का 5 प्रतिशत तक सामाजिक सुरक्षा फंड में योगदान देना होगा। इसका सीधा मतलब है कि आपके खाने का ऑर्डर या आपकी कैब की सवारी काफी महंगी हो जाएगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, एक सामान्य फूड डिलीवरी ऑर्डर पर लगभग 3.2 रुपये का अतिरिक्त खर्च लग सकता है। क्विक-कॉमर्स ऑर्डर्स पर यह खर्च 2.4 रुपये तक हो सकता है। ये संख्याएं छोटी दिख सकती हैं, लेकिन जब आप महीने भर के ऑर्डर्स को गुणा करेंगे, तो आपका बजट गड़बड़ा जाएगा।

डिलीवरी पार्टनर्स को क्या मिलेगा?

नए लेबर कोड का सकारात्मक पहलू यह है कि पहली बार गिग वर्कर्स को कानूनी मान्यता मिली है। अब वे सिर्फ “ठेकेदार” नहीं रहे, बल्कि उन्हें पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा और मातृत्व लाभ जैसी सुविधाएं मिलेंगी।​​

सरकार ने एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर सिस्टम भी बनाया है जिससे ये वर्कर्स अगर एक शहर से दूसरे शहर चले जाएं या एक प्लेटफॉर्म छोड़कर दूसरे पर जाएं, तो उनके लाभ पोर्टेबल रहेंगे। ई-श्रम डेटाबेस के जरिये सरकार इस पूरे प्रक्रिया को ट्रैक करेगी।​​

क्या प्लेटफॉर्म्स को कोई विकल्प बचा है?

ब्रोकरेज एनालिस्ट्स का मानना है कि इन प्लेटफॉर्मों के पास तीन रास्ते बचे हैं। पहला, प्लेटफॉर्म फीस को सीधे बढ़ा दें। दूसरा, डायनामिक प्राइसिंग के जरिये सर्ज चार्ज लगाएं, और तीसरा, डिलीवरी चार्ज ही बढ़ा दें। लेकिन अगर सरकार इस योगदान को एक केंद्रीय फंड के माध्यम से संचालित करे, तो असली अतिरिक्त लागत केवल 1 से 2 रुपये तक सीमित रह सकती है।

औपचारिक स्टाफिंग को मिला अवसर

जबकि गिग इकॉनमी प्लेटफॉर्म्स इस नियमन से परेशान हैं, औपचारिक स्टाफिंग कंपनियों के लिए यह सुनहरा अवसर है। नए कोड के तहत नियम सरल और एकीकृत हो गए हैं। कंपनियां अब टीमलीज जैसी स्टाफिंग सेवाओं की ओर ज्यादा आकर्षित हो सकती हैं।​

सबसे बड़ी चुनौती

लेकिन सच यह है कि इस कानून को पूरी तरह लागू करना आसान नहीं होगा। गिग वर्कर्स के काम के घंटे अक्सर अनियमित होते हैं और वे एक समय में कई प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हैं। ऐसे में उनके मिलने वाले लाभों का हिसाब रखना कठिन है। सरकार का ई-श्रम डेटाबेस इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियां अभी भी बाकी हैं।​

Author
Divya

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