
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई सड़क दुर्घटना बाइक चालक की लापरवाही के कारण होती है, तो पीछे बैठी सवारी (पिलियन राइडर) को स्वचालित रुप से दुर्घटना का दोषी नहीं माना जा सकता, यह फैसला मुआवजे के मामलों में यात्रियों के अधिकारों को मजबूत करता है।
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निचली अदालतों की ‘गलत धारणा’ खारिज
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने उस आम धारणा को खारिज कर दिया, जिसके तहत कई बार ट्रिब्यूनल या हाई कोर्ट यह मान लेते थे कि चूंकि सवारी और चालक एक ही वाहन पर थे, इसलिए सवारी को भी चालक की लापरवाही में बराबर का हिस्सेदार होना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में मुआवजे में की गई 10% कटौती को रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालत ने “गलत धारणा” के आधार पर फैसला सुनाया था।
दोष साबित करने के लिए ठोस सबूत जरूरी
अदालत ने अपने फैसले में यह रेखांकित किया कि किसी सवारी पर अंशदायी लापरवाही (Contributory Negligence) का आरोप केवल तभी लगाया जा सकता है जब दुर्घटना में उनके सीधे योगदान को साबित करने के लिए विशिष्ट और पुख्ता सबूत पेश किए जाएं।
न्यायालय ने कहा, “केवल वाहन पर पीछे बैठे होने का तथ्य अपने आप में यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है कि पीड़ित (सवारी) भी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार था।”
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फैसले का महत्व
इस फैसले का दूरगामी प्रभाव होगा, खासकर उन मामलों में जहां दुर्घटना में घायल हुए या जान गंवाने वाले यात्रियों के परिजन मुआवजे के लिए दावा करते हैं, यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बीमा कंपनियां या बचाव पक्ष केवल चालक की गलती का हवाला देकर सवारी के मुआवजे की राशि में मनमानी कटौती नहीं कर सकते।
अब किसी भी कटौती के लिए यह साबित करना अनिवार्य होगा कि सवारी ने जानबूझकर कोई ऐसा कार्य किया, जैसे कि चालक का ध्यान भटकाना, जिससे दुर्घटना हुई हो। जब तक ऐसा कोई कृत्य साबित नहीं होता, सवारी को निर्दोष माना जाएगा और वह पूर्ण मुआवजे का हकदार होगा।
















