
अक्सर परिवारों में संपत्ति को लेकर विवाद गहरा जाता है, खासकर जब दादा या चाचा पोते को उसके पैतृक हिस्से से वंचित करने का प्रयास करते हैं, कानूनी रुप से पोते का अपने दादा की संपत्ति पर कितना अधिकार है, यह समझना बेहद जरुरी है, संपत्ति कानून विशेषज्ञ बताते हैं कि पोते के अधिकार मुख्य रूप से संपत्ति के प्रकार (पैतृक या स्व-अर्जित) पर निर्भर करते हैं।
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पैतृक संपत्ति पर जन्मसिद्ध अधिकार
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत, पोते का अपने दादा की पैतृक संपत्ति पर जन्म से ही अधिकार होता है। पैतृक संपत्ति वह है जो चार पीढ़ियों से चली आ रही हो (परदादा, दादा, पिता और पोते)।
- बराबर की हिस्सेदारी: इस प्रकार की संपत्ति में पोते का अधिकार उसके पिता के बराबर ही होता है। दादा या परिवार का कोई अन्य सदस्य, जैसे कि चाचा, इस अधिकार को किसी वसीयत या मौखिक समझौते से खत्म नहीं कर सकता।
- कानूनी कार्रवाई: यदि आपको इस संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जा रहा है, तो आप कानूनी तौर पर अपना हक मांग सकते हैं।
स्व-अर्जित संपत्ति पर निर्भर करता है मामला
स्थिति तब बदल जाती है जब संपत्ति दादा द्वारा स्वयं अर्जित की गई हो, यानी उन्होंने उसे अपने पैसों से खरीदा हो या उन्हें किसी अन्य स्रोत से उपहार में मिली हो।
- दादा की मर्जी सर्वोपरि: स्व-अर्जित संपत्ति के मामले में, दादा अपनी संपत्ति जिसे चाहें उसे देने के लिए स्वतंत्र हैं। वह अपनी वसीयत में किसी एक बेटे, बेटी, या किसी बाहरी व्यक्ति के नाम भी संपत्ति लिख सकते हैं। पोते का इस पर जन्म से कोई सीधा अधिकार नहीं होता।
- उत्तराधिकार की स्थिति: हालांकि, यदि दादा बिना वसीयत बनाए मर जाते हैं, तो संपत्ति उनके तत्काल कानूनी वारिसों (बेटे, बेटियां, पत्नी) के बीच बंट जाती है, और पोता अपने मृत पिता के हिस्से का दावा कर सकता है।
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कानूनी राहत के उपाय
अगर दादा और चाचा मिलकर आपको आपके वैध हिस्से (खासकर पैतृक संपत्ति में) से वंचित कर रहे हैं, तो पोता कानूनी मदद ले सकता है:
- सबसे पहले संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े सभी दस्तावेज इकट्ठा करें।
- एक वकील के माध्यम से परिवार के सदस्यों को संपत्ति में हिस्सेदारी के लिए कानूनी नोटिस भेजा जा सकता है।
- यदि नोटिस का असर नहीं होता है, तो स्थानीय सिविल कोर्ट में संपत्ति के बंटवारे (विभाजन) के लिए “पार्टीशन सूट” (Partition Suit) दायर किया जा सकता है।
- यदि संपत्ति बेचे जाने की आशंका है, तो अदालत से ‘स्टे ऑर्डर’ या निषेधाज्ञा आदेश प्राप्त किया जा सकता है, ताकि विवाद सुलझने तक संपत्ति का सौदा न हो सके।
पीड़ित पक्ष अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी विशेषज्ञों की सलाह ले सकते हैं और LawRato या Rest The Case जैसी कानूनी सहायता प्रदान करने वाली वेबसाइटों पर विशेषज्ञ वकील ढूंढ सकते हैं।
















